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नसीबपुर के मैदान से शुरू हुई क्रांति की लड़ाई की कहानी आज भी रोंगटे खड़े कर देती है


नारनौल, रामचन्द्र सैनी। नारनौल का नसीबपुर का  ऐतिहासिक मैदान हर वर्ष हमें उन शहीदों की याद दिलाता है जिन्होंने हंसते-हंसते अपने भारत वर्ष के लिए प्राणों की आहुति दी। तब उन वीरों के साथ-साथ उन माताओं की भी याद आती है जिन्होंने देश को ऐसे सपूत दिये। प्रत्येक मां अपने सच्चे राना प्रतापों और शिवाजियों पर नाज किया करती है। इसी प्रकार सच्चे भारत मां को आज भी अपने उस अमर वीर केसरी राव तुलाराम जी पर गर्व है, जिसने उसकी गोद में जन्म लेकर उसके दूध को नहीं लजाया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भारत मां को अंग्रेजों की दासता से छुड़ाने के लिए जहां तात्यां टोपे, रानी झांसी ने विद्रोह का बिगुल बजाया। यहां हरियाणा प्रदेश में रेवाड़ी नरेश राव तुलाराम जी ने भी अपने प्रदेश के नाम को ऊंचा बनाए रखने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया और दुनिया की बड़ी शक्तिशाली हुकूमत से उन्होंने मुकाबला किया। वे हमारे स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी अद्वितीय विभूति

थे. जिन्होंने देश की अखंड अविभाज्य सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हुए खण्ड-खण्ड में बिखरे हमारे राष्ट्रवाद को एक सूत्र में गूंथा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए उसे एक ऐसे विराट, अदम्य जन आंदोलन में विकसित किया, जिसकी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं मिले। देश के लिए सर्वस्व समर्पण की भावना राव तुलाराम जी का जीवन ऐसा ओतप्रोत था कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश अपयश कोई उन्हें अपने ध्येय यात्रा सेवा विचलित नहीं कर सका।

भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम 1857 में ही आरम्भ हो चुका था और समय-समय पर देशभक्तों ने अपने त्याग और बलिदान के द्वारा उसमें योगदान दिया और देश का मस्तक ऊंचा किया। ऐसे ही देशभक्तों में राव तुलाराम जी थे, जिनका त्याग और बलिदान देश के स्वतंत्रता इतिहास में सदा अमर रहेगा।

इस क्रांति के महानायक राव तुलाराम कुछ दृष्टियों में उस काल के अन्य महान नेताओं से भी आगे थे। मंगल पाण्डेय के क्रांति बीज को सबसे पहले उन्होंने ही समझा था और एक क्षण भी सोच-विचार में बर्बाद न करके तत्काल उन्होंने क्रांति का अपना रास्ता निर्धारित कर लिया था और बहादुर शाह जफर को स्वाधीन भारत का शासक प्रतीक मान कर अपना पूर्ण सहयोग उन्हें  सौंपा ।

राव तुलाराम में तात्या टोपे जैसी अदभुत संगठन शक्ति थी । नाना साहब जैसी नेतृत्व क्षमता, कुंवर सिंह जैसे युद्ध क्षमता व रानी लक्ष्मीबाई जैसा धैर्य व अजीमुल्ला जैसी  कूटनीति थी। यही नहीं  जो काम 50- 60 साल बाद सांवरकर, श्यामजी पंडित, राजा महेन्द्र प्रताप व सुभाष चन्द्र बोस ने किया, उसकी नींव 1857 में ही डाल चुके थे। राव तुलाराम हरियाणा स्थित व दिल्ली से लगे रेवाड़ी के राजघराने में जन्में थे। उन्होंने कम उम्र में ही अपने पिता राव पूर्ण सिंह की मृत्यु के बाद रेवाड़ी राज्य की सत्ता संभाल ली तथा सैनिक शक्ति बढ़ाने की और ध्यान दिया 'ताकि विदेशी साम्राज्य से लोहा ले सकें। वे न किसी व्यक्ति के थे, न ही जाति विशेष के। उन्होंने बहादुर शाह को पूर्ण सहयोग दिया। वे जनरल बख्त खां के अंतरंग मित्र व सहयोगी रहे। इससे पूर्व मराठों का उन्होंने पूरी तरह साथ दिया। नाना पेशवा उन पर परम विश्वास करते थे। तात्यां टोपे उन्हें अपना दाहिना हाथ मानते थे।

भावी आजाद हिन्द फौज उनके ही प्रयत्नों का परिणाम थी। राव तुलाराम को इस बात का श्रेय प्राप्त है कि उन्होंने अफगानिस्तान में प्रथम भारतीय स्वाधीनता सेना का गठत किया। उन्होंने ईरान को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का संदेश दिया व रूस से संपर्क किया।

राव तुलाराम ने उसी समय आधुनिक हथियारों का महत्व समझ लिया था। अतः रेवाड़ी के पास गोकुलगढ़ में तोपें ढालने के कारखाने की शुरुआत की थी। खेद है कि इस महत्वपूर्ण तथ्य को या तो टीपू ने ही समझा था या फिर राव तुलाराम ने। इस और अगर अन्य नेताओं ने भी ध्यान दिया तो स्थाधीनता के लिए संघर्षरत भारतीय सेनाओं का मनोबल कुछ और ही होता। 

राव तुलाराम ने वक्त-वक्त पर न सिर्फ बादुरशाह जफर को  रुपया, रसद और सैनिक भेज भेजकर क्रांतिकारियों के मनोबल को बढ़ाया बल्कि राजपूताना व दिल्ली के निकटवर्ती राज्यों के राजाओं व नवाबों से सम्पर्क करके उन्होंने उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित किया। स्वयं उन्होंने अंग्रेजी फौज से कई लड़ाइयां बहुत बहादुरी लड़ी तथा दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा होने पर भी हिम्मत नहीं हारी। बल्कि फिर से सभी क्रांतिकारी शक्तियों की इक‌ट्ठा करके आखिरी मोर्चा नारनौल के निकट  16 नवम्बर 1857 के दिन नारनौल नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा जमाया और ऐसी वीरता से युद्ध लड़ा कि जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। राव तुलाराम के नेतृत्व में भारतीय क्रांतिकारियों की वीरता और युद्ध के अदम्य साहस स्वयं अंग्रेज कमांडरों ने अपने उस समय के लेखों में दिल खोलकर सराहना की। इनके दो भाई देव कृष्ण गोपाल व राव रामलाल पांच हजार देशभक्तों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। राव तुलाराम बेहद जख्मी होकर भी, लड़ाई जारी रखते हुए बचे हुए साथियों सहित नाना साहब व तात्यां टोपे से काल्पी में जा मिले ताकि उनके साथ मिलकर स्वतंत्रता के संग्राम को जारी रखा जा सके। इन्हीं नेताओं के आग्रह पर विदेशों से ईरान, अफगानिस्तान व रूस से मदद लेने के लिए जान हथेली पर रखकर उन देश में जा पहुंचे और आखिरी दम तक देश को आजाद कराने का प्रयत्न करते रहे। उसी समय उन्होंने काबुल में रहकर भारत से बचकर आए क्रांतिकारियों को पहली आजाद हिन्द फौज में उन्हें सम्मिलित किया।

यह दुर्भाग्य की बात है कि उनका शरीर इतना कठिन श्रम व तनाव सहन कर सका और विदेश में उनका आल्पायु में ही 23 सितम्बर 1863 को देहांत हो गया। काबुल में बड़ा शोक मनाया गया और झंडे झुका दिये गये तथा सैनिक रीति से उनका दाह-संस्कार काबुल के दिल्ली गेट पर कर दिया गया। आज राव तुलाराम का नश्वर शरीर नहीं है, परन्तु उनका देश उनके वचन तथा अद्वितीय व्यक्तित्व के लिए उन्हें सदा याद किया जाता रहेगा। हर भारतवासी के ऐसे महापुरुषों पर गर्व है। इस महान शहीद की पुण्य तिथि उस समय वीरगति को प्राप्त सभी शहीदों की याद दिलाती है तथा राष्ट्र व देश के प्रति निष्ठा जागृत करती है और भावी पीढ़ी को प्रेरणा देती है। राव तुलाराम  का सारा जीवन बलिदान, त्याग, निर्भयता तथा तपस्या की प्रेम गाथा है।

राव तुलाराम स्मारक समिति हर वर्ष 23 सितम्बर को रेवाड़ी में राव तुलाराम पार्क में शहीदी दिवस का आयोजन करके राव तुलाराम व 1857 के सभी शहीदों तथा पाक व चीन के युद्ध में वीरगति को प्राप्त सभी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करके राष्ट्र व देश के प्रति अपनी निष्ठा को प्रकट करती है।

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