ब्रह्मलीन हुए नागा बाबा जय गिरि महाराज जी, सनातन संत परंपरा को अपूरणीय क्षति
डीसी नहलिया (फिरोजपुर झिरका) सनातन धर्म के वरिष्ठ तपस्वी और नागा संप्रदाय के प्रतिष्ठित संत नागा बाबा जय गिरि महाराज जी का ब्रह्मलीन होना संत समाज और धर्म प्रेमियों के लिए गहरा आघात है। उनके देहावसान से सनातन परंपरा ने एक ऐसे साधक को खो दिया, जिन्होंने तप, त्याग, साधना और वैराग्य को अपने जीवन का मूल आधार बनाया। नागा बाबा जय गिरि महाराज जी को अखंड और कठोर तपस्या के लिए जाना जाता था। उनकी साधना का प्रमुख केंद्र हनुमान घाट मंदिर रहा, जबकि झिरका की पहाड़ियों में स्थित प्राचीन मोर कुटी वर्षों तक उनकी तपोभूमि बनी रही। इस स्थल पर उन्होंने दीर्घकाल तक एकांत साधना कर सनातन चेतना को सुदृढ़ किया। स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार मोर कुटी क्षेत्र आज भी उनकी तपस्या की ऊर्जा का साक्षी माना जाता है। महाराज जी प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त तथा बजरंगबली के परम उपासक थे। उनका संपूर्ण जीवन रामभक्ति, हनुमान आराधना और शिव साधना को समर्पित रहा। संत समाज में वे अनुशासन, सादगी और वैराग्य के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित थे। उनकी दिनचर्या में जप,
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