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फ़र्श से अर्श तक: दर्द, संघर्ष और हौसले की मिसाल – IAS सविता प्रधान की प्रेरणादायक कहानी

 फ़र्श से अर्श तक: दर्द, संघर्ष और हौसले की मिसाल – IAS सविता प्रधान की प्रेरणादायक कहानी


"अगर जीवन में अंधेरा बहुत गहरा हो, तो समझ लीजिए कि सूरज निकलने वाला है।"


कुछ कहानियाँ केवल सफलता की नहीं होतीं, बल्कि उन ज़ख्मों की होती हैं जिन्हें समय भी पूरी तरह नहीं भर पाता। यह कहानी है एक ऐसी महिला की, जिसने अत्याचार, अपमान, भूख, हिंसा और मौत के मुहाने से लौटकर देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) तक का सफर तय किया। यह कहानी है सविता प्रधान की—एक ऐसी महिला की, जिसने साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, यदि इरादे मजबूत हों तो मंज़िल जरूर मिलती है।

बचपन में ही शादी और सपनों का टूटना

सविता प्रधान की शादी मात्र 16 वर्ष की उम्र में कर दी गई। जिस उम्र में एक लड़की अपने भविष्य के सपने देखती है, उस उम्र में उनके जीवन की शुरुआत दर्द और संघर्ष से हुई।

शादी के बाद उनका वैवाहिक जीवन किसी बुरे सपने से कम नहीं था। पति छोटी-छोटी बातों पर उन्हें सबके सामने अपमानित करते, मारते-पीटते और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे। ससुराल में उन्हें परिवार का सदस्य नहीं, बल्कि एक नौकरानी की तरह रखा जाता था।

सुबह से रात तक घर का सारा काम करना पड़ता था। सफाई, बर्तन, खाना बनाना और हर आदेश का पालन करना उनकी मजबूरी बन गया था। इतना ही नहीं, कई बार उन्हें भरपेट भोजन तक नसीब नहीं होता था।

सविता बताती हैं कि कई बार वे रोटी को अपने कपड़ों में छिपाकर बाथरूम ले जाती थीं और वहीं बैठकर सिर्फ सूखी रोटी खाकर अपना पेट भरती थीं। उस समय उन्हें यह भी समझ नहीं आता था कि उनके साथ जो हो रहा है, वह कितना बड़ा अन्याय है।



हर दिन नई यातना

दिन बीतते गए और अत्याचार बढ़ता गया। छोटी-छोटी बातों पर मारपीट, गालियाँ, मानसिक प्रताड़ना और शारीरिक हिंसा उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।

एक दिन उनके पिता उनसे मिलने आए। सविता ने रोते हुए उनसे विनती की कि उन्हें अपने साथ घर ले चलें। पिता ने शाम को वापस आने का वादा किया।

लेकिन वह शाम कभी नहीं आई।

उस दिन सविता को एहसास हो गया कि इस नरक से उन्हें निकालने कोई नहीं आने वाला। अब उन्हें अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी।

जब जीवन समाप्त करने का विचार आया

समय के साथ वे दो बच्चों की माँ बन चुकी थीं, लेकिन उनके हालात नहीं बदले।

सिर पर गहरे घाव, हाथों पर कट के निशान और पीठ पर जलने के दाग उनकी पीड़ा की गवाही देते थे। रोज़-रोज़ का अत्याचार उन्हें भीतर से तोड़ चुका था।



एक दिन उन्होंने जीवन समाप्त करने का निर्णय ले लिया।

उन्होंने अपने छोटे बेटे को सुलाया, दूसरे बच्चे को दूध पिलाया, दोनों का माथा चूमा और मन ही मन अंतिम विदाई दी।

उन्होंने एक स्टूल खींचा, पंखे से साड़ी बांधी और फाँसी लगाने की तैयारी कर ली।

उसी समय खिड़की से उनकी सास ने उन्हें देखा।

सविता को उम्मीद थी कि शायद कोई उन्हें रोक लेगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उनकी सास बिना कुछ कहे वापस चली गईं।

यही वह क्षण था जिसने सविता की सोच बदल दी।

उन्होंने स्वयं से कहा—

"जो लोग मेरी ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं समझते, उनके लिए मैं अपनी जान क्यों दूँ?"

उसी पल उन्होंने मरने का विचार छोड़ दिया और जीने का फैसला किया।

यही निर्णय उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।

नई शुरुआत भी आसान नहीं थी

सविता अपने बच्चों को लेकर ससुराल छोड़ आईं और रिश्तेदारों के सहारे रहने लगीं।

जीवनयापन के लिए उन्होंने पार्लर में काम किया, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।



लेकिन मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं।

अलग रहने के बाद भी उनका पति कई बार आता और उनके साथ मारपीट करता।

एक घटना तो इतनी अमानवीय थी कि सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए।

एक दिन जब वे परीक्षा देने जा रही थीं, उनके पति ने बच्चों के सामने उन्हें बुरी तरह पीटा और एक बाल्टी में पेशाब करके उनके ऊपर फेंक दिया।

सविता ने बिना हार माने फिर से स्नान किया, कपड़े बदले और समय पर परीक्षा देने चली गईं।

वे कहती हैं—

"उस दिन मेरा दिल पत्थर नहीं बना था, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गया था।"

शिक्षा बनी सबसे बड़ी ताकत

सविता जानती थीं कि गरीबी, हिंसा और अपमान से निकलने का सबसे बड़ा रास्ता शिक्षा है।

उन्होंने कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई जारी रखी।

दिन में काम, रात में पढ़ाई और बच्चों की परवरिश—इन तीनों जिम्मेदारियों को उन्होंने एक साथ निभाया।

उनकी मेहनत रंग लाई।

उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (PCS) की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और सरकारी अधिकारी बनीं।

एक आदिवासी छात्रा के रूप में उनकी इस उपलब्धि पर उन्हें सरकार की ओर से 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति भी मिली।



लेकिन उनका सपना इससे भी बड़ा था।

UPSC में भी पहली ही कोशिश में सफलता

सरकारी अधिकारी बनने के बाद भी उन्होंने खुद को यहीं नहीं रोका।

उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2017 की तैयारी शुरू की।

असंख्य कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने पहली ही कोशिश में प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार सफलतापूर्वक पास कर लिया।

उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में हुआ।

जिस महिला को कभी भरपेट भोजन तक नहीं मिलता था, वही आज देश की प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।




आज हजारों महिलाओं की प्रेरणा हैं

आज IAS सविता प्रधान केवल एक अधिकारी नहीं हैं, बल्कि उन लाखों महिलाओं की उम्मीद हैं जो घरेलू हिंसा, सामाजिक भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रही हैं।

वे विशेष रूप से गरीब परिवारों, आदिवासी समुदायों और महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के लिए कार्य करती हैं।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि—

परिस्थितियाँ इंसान को कमजोर नहीं, मजबूत बनाती हैं।
शिक्षा हर बंधन को तोड़ सकती है।
आत्मविश्वास सबसे बड़ा हथियार है।
हार मान लेना समाधान नहीं, संघर्ष करना ही जीवन है।
जीवन का सबसे बड़ा संदेश

सविता प्रधान की कहानी हमें सिखाती है कि यदि एक महिला, जिसने भूख, हिंसा, अपमान और आत्महत्या तक का विचार देखा हो, वही महिला देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं तक पहुँच सकती है, तो दुनिया में कोई भी सपना असंभव नहीं है।

कठिनाइयाँ हमें रोकने नहीं, हमें मजबूत बनाने आती हैं।

याद रखिए—

"संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।"

यदि कभी जीवन में निराशा आए, तो सविता प्रधान की कहानी को याद कीजिए।

उन्होंने परिस्थितियों से हार नहीं मानी, बल्कि उन्हें हराकर इतिहास रच दिया।

यही है फ़र्श से अर्श तक का वास्तविक सफर।


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