सभा को संबोधित करते हुए राधिका जैन ने कहा कि ‘ब्रह्म’ का अर्थ आत्मा और ‘चर्या’ का अर्थ आचरण है। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ हुआ आत्मा में रमण करना। उन्होंने कहा कि जो साधक आत्मा के हित का इच्छुक है, उसका कर्तव्य है कि वह अपने शील और ब्रह्मचर्य की रक्षा करे। आत्मा का आत्मा में रमण तभी संभव है, जब मनुष्य अपने मन को विषय-वासनाओं और बाहरी आकर्षणों से पूर्ण रूप से मुक्त कर सके।
उन्होंने आगे कहा कि सभी पदार्थों से मन हटाकर आत्मा में लगाना ही सर्वोच्च ब्रह्मचर्य धर्म है। यह केवल बाहरी संयम तक सीमित नहीं है, बल्कि भीतरी शुद्धि और आत्म-चेतना का मार्ग है। विषयों में नियंत्रण रखना, मन-वचन-काया को संयमित करना और आत्मा में स्थिर होना ही ब्रह्मचर्य धर्म की मूल भावना है।
समाजसेविका ने कहा कि तप, त्याग और संयम का वास्तविक आधार भी ब्रह्मचर्य है। यदि साधक इंद्रियों के बंधन में ही उलझा रहे, तो उसका संयम और त्याग केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। ब्रह्मचर्य वह साधन है, जो साधक को आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाता है। इसी कारण दशलक्षण धर्म में इसे सर्वोच्च महत्व दिया गया है।
राधिका जैन ने बताया कि उत्तम आकिंचन धर्म के सद्भाव से ही ब्रह्मचर्य धर्म प्रकट होता है। यह व्यक्ति को मोह-माया, विषय-वासनाओं और भौतिक आकर्षणों से दूर कर आत्मिक शांति और स्थिरता की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला साधक न केवल अपने जीवन में संतुलन स्थापित करता है, बल्कि समाज में भी संयम और सदाचार का आदर्श प्रस्तुत करता है।
अंत में उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य कोई दमन नहीं है, बल्कि आत्मा को उसकी शुद्धता की ओर ले जाने का साधन है। जो साधक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वही आत्मिक शांति, स्थिरता और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सफल होता है।
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