एक मजदूर की दास्तान एक सच्ची घटना: मेवात के गलियारों में न्याय की खोज।
मेवात के फिरोजपुर झिरका खंड के एक छोटे से गाँव में, जहाँ अरावली की पहाड़ियाँ दूर से दिखती थीं, एक गरीब मजदूर रहता था, जिसका नाम था रहमत अली। रहमत अली की जिंदगी एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में कटती थी। उसकी पत्नी जमीला और दो बच्चे, सलीम और फातिमा, उसकी दुनिया थे। परिवार का पेट पालने के लिए वह रोज सुबह घर से निकलता और शाम को थका-हारा लौटता।
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रहमत की जिंदगी में तूफ़ान तब आया, जब गाँव के एक दबंग ज़मींदार ने उसकी छोटी सी झोंपड़ी पर अपना दावा ठोक दिया। ज़मींदार का कहना था कि रहमत की ज़मीन उसके पुरखों की है और उसने उस जमीन पर जबरन कब्जा कर रखा है। रहमत के पास अपनी झोंपड़ी का कोई पक्का कागज़ नहीं था, केवल एक पुराना रजिस्ट्री का टुकड़ा था जो उसके बाप ने कभी बनवाया था। लेकिन ज़मींदार की पहुँच ऊपर तक थी।
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गाँव के नंबरदार ने भी ज़मींदार का साथ दिया। जब रहमत उसके पास गया, तो नंबरदार ने कहा, "देख रहमत, तू गरीब आदमी है। इस चक्कर में मत पड़। कुछ पैसे ले और चुपचाप गाँव छोड़ दे।" रहमत ने मना कर दिया, तो नंबरदार ने उसे धमकाया, "अगर गाँव में रहना है तो मेरी बात मान, नहीं तो पुलिस तुझे किसी फर्जी केस में फँसा देगी।"
डरकर रहमत तहसील कार्यालय पहुँचा। वहाँ उसने अपनी बात पटवारी को बताई। पटवारी ने उसके पुराने रजिस्ट्री के कागज़ देखे और सिर हिलाकर बोला, "यह कागज़ तो बहुत पुराने हैं। इन्हें अपडेट कराना पड़ेगा और इसमें तुम्हारा नाम भी नहीं है। यह ज़मीन तो सरकारी है, या फिर ज़मींदार की।" रहमत ने हाथ जोड़कर कहा, "जनाब, यह मेरी बाप-दादा की जमीन है।" पटवारी ने उसकी एक न सुनी और कहा, "अगर तुम्हें अपनी बात मनवानी है, तो 'कुछ' तो खर्च करना पड़ेगा। नहीं तो यह फाइल कभी नहीं बढ़ेगी।" रहमत के पास रिश्वत देने के लिए एक रुपया भी नहीं था। वह खाली हाथ लौट आया।
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अगले दिन, ज़मींदार ने अपने गुंडों के साथ आकर रहमत की झोंपड़ी तोड़ दी। रहमत और उसके परिवार ने मदद के लिए पुलिस चौकी का दरवाजा खटखटाया। वहाँ थानेदार ने उनकी शिकायत लिखने से मना कर दिया। "यह तो जमीनी विवाद है। कोर्ट जाओ," कहकर उसने उन्हें भगा दिया। रहमत ने देखा कि थानेदार और ज़मींदार फोन पर बात कर रहे थे और हंस रहे थे। रहमत ने किसी तरह एक सिपाही से शिकायत दर्ज करवाने की मिन्नतें की। सिपाही ने कहा, "शिकायत तो दर्ज हो जाएगी, पर उसे आगे बढ़ाने के लिए 'पानी' देना होगा।" मजबूरन, रहमत ने अपनी पत्नी की इकलौती सोने की बाली बेचकर सिपाही को रिश्वत दी। शिकायत दर्ज हुई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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रहमत ने हिम्मत नहीं हारी और वकीलों की सलाह पर कोर्ट जाने का फैसला किया। कोर्ट में उसे एक वकील मिला, जिसने मोटी फीस मांगी। रहमत ने अपने पड़ोसियों से उधार लेकर वकील को पैसे दिए। कोर्ट में तारीख पर तारीख मिलती गई। वकील भी रहमत से बार-बार पैसों की माँग करता रहता। एक दिन वकील ने कहा, "इस मामले में जीतने के लिए हमें कोर्ट के बाबू को भी 'चाय-पानी' देना होगा।" रहमत ने अपना इकलौता भैंस बेचकर बाबू को रिश्वत दी। लेकिन फिर भी केस की सुनवाई नहीं हुई। जज ने भी ज़मींदार के पक्ष में फैसला सुना दिया, क्योंकि ज़मींदार ने पहले ही जज के रिश्तेदारों को कई तोहफे भेज रखे थे।
हताश होकर रहमत ने एक और उम्मीद की किरण देखी: परिवार पहचान पत्र (PPP)। उसे लगा कि PPP से उसकी पहचान और जमीन का पता साबित हो जाएगा। वह नगरपालिका के दफ्तर पहुँचा। वहाँ उसे बताया गया कि उसका परिवार पहचान पत्र बना हुआ है, लेकिन उसमें उसका पता गलत है। उसे अपना पता ठीक कराने के लिए बोला गया। नगरपालिका के बाबू ने कहा, "पता तो ठीक हो जाएगा, लेकिन इसके लिए तहसीलदार के हस्ताक्षर चाहिए होंगे और साथ ही 'हस्ताक्षर' के लिए कुछ तो खर्च करना पड़ेगा।" रहमत को फिर से रिश्वत देनी पड़ी। महीनों बाद जब उसका PPP ठीक होकर आया, तो उसमें भी उसका पता आधा-अधूरा था।
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अब रहमत के पास एक ही रास्ता बचा था: तहसील में अपनी जमीन की रजिस्ट्री की सही कॉपी निकलवाना। वह तहसील रजिस्ट्री बाबू के पास गया। रजिस्ट्री बाबू ने पुरानी रजिस्ट्री देखी और बोला, "यह तो बहुत पुरानी है। इसमें बहुत दिक्कतें हैं। अगर आप चाहते हैं कि मैं इसमें से आपका नाम ढूंढूँ और सही कॉपी निकालूँ, तो यह काम ऐसे ही नहीं होगा। ऊपर से अधिकारी भी पैसे मांगते हैं, और मुझे भी तो कुछ चाहिए।" रहमत ने अपनी अंतिम बचत के कुछ रुपए निकालकर रजिस्ट्री बाबू को दिए, लेकिन कुछ दिन बाद बाबू ने फोन करके कहा, "तुमने जो पैसे दिए थे, वो तो कम हैं। ज़मीन के कागज़ों को निकालने के लिए और पैसे लगेंगे।" रहमत समझ गया कि यह एक अंतहीन सिलसिला है।
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थक-हारकर और हर तरफ से निराश होकर रहमत ने एक आखिरी उम्मीद देखी—सीएम विंडो एमिनेंट पर्सन। गाँव के एक बुजुर्ग ने उसे सलाह दी थी कि मुख्यमंत्री सीधे गरीबों की बात सुनते हैं। रहमत ने अपनी सारी कहानी एक कागज पर लिखी और सीएम विंडो पर शिकायत दर्ज करवाई। उसे लगा कि अब उसे न्याय ज़रूर मिलेगा।
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कुछ दिनों बाद, सीएम विंडो से एक जाँच अधिकारी आया। यह वही अधिकारी था जिसके बाबू ने रहमत से पैसे लिए थे। अधिकारी ने रहमत को अपने दफ्तर में बुलाया। रहमत को लगा कि उसकी बात सुनी जाएगी। लेकिन वहाँ पहुँचते ही, अधिकारी ने उसे धमकाना शुरू कर दिया, "तूने झूठी शिकायत क्यों की है? ज़मींदार ने तो बताया है कि तूने जबरन उसकी जमीन पर कब्जा कर रखा है।" रहमत ने अपनी सच्चाई बताने की कोशिश की, लेकिन अधिकारी ने उसकी एक न सुनी। उसने रहमत को ही दोषी ठहरा दिया। जाँच के दौरान, अधिकारी ने अपने ही कर्मचारियों से मिलीभगत करके एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें रहमत को झूठा और बेईमान साबित किया गया था।
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अंत में, अधिकारी ने अपनी जाँच रिपोर्ट मुख्यमंत्री विंडो के सदस्यों को भेज दी, जिसमें उसने लिखा था कि "शिकायतकर्ता ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है।" बिना रहमत से कोई पूछताछ किए, सीएम विंडो एमिनेंट पर्सन ने उस रिपोर्ट पर दस्तखत कर दिए और फाइल बंद कर दी गई।
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रहमत की कहानी मेवात के कई गाँवों में सुनी जा सकती थी। उसकी मेहनत का फल उसे नहीं मिला, बल्कि उसे और भी दर्द और निराशा मिली। वह फिर से अपनी टूटी-फूटी झोंपड़ी में लौट आया, जहाँ उसकी पत्नी और बच्चे उसकी राह देख रहे थे।
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इस कहानी से यह साफ होता है कि कैसे सरकारी दफ्तरों में हर स्तर पर भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा रखी हैं। एक गरीब और अनपढ़ मजदूर के लिए न्याय एक सपना बनकर रह जाता है, क्योंकि हर दफ्तर में उसे सिर्फ रिश्वत और दुत्कार मिलती है। सीएम विंडो जैसी पहल भी तब तक असफल है, जब तक जाँच करने वाले अधिकारी ईमानदार न हों। रहमत की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की कहानी है जो गरीबों के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों के लिए काम करती है।
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चेतावनी:- यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित रचना है। इसमें वर्णित सभी पात्र, घटनाएँ और स्थान केवल कहानी को आगे बढ़ाने के लिए बनाये गए हैं। यह कहानी किसी व्यक्ति ने आम गुप्त रखने पर उसके साथ क्या क्या हुआ तब बताई है यदि किसी अन्य पात्र का नाम, स्थान, या घटना किसी जीवित या मृत व्यक्ति से मेल खाता है, तो यह केवल एक संयोग है और इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
"लेखक डीसी नहलिया" मोबाइल नंबर 9813527685
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